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सपनो की अलग दुनिया है

मेरी भी एक सपनो की अलग दुनिया है
उसमे काई रंग के सपने हैं
कुछ टूटे और कुछ अधूरे हैं
पर सब सपने मेरे अपने हैं

मैं चाहूं तो उन्हे जोड़ लूं
कभी यूँही उन्हे दुबारा जी लूं
या उन्हे भूलकर छोड़ दूं
या बस अपने हाथों से तोड़ दूं

सपनो से लड़ता भी हूँ बहुत
उनसे मैं रूठता भी हूँ बहुत
पर क्या करूँ छोड़ नही सकता इनको
क्यूंकी ये सब हैं दिल के करीब बहुत

कुछ सपने तो मुझे आकर कहते हैं
अपने अधूरेपन को भरने को कहते हैं
मेरे बस में नही उन्हे पूरा करना
क्यूंकी अक्सर ये बस यूँही टूट जाते हैं

पर फिर भी मैं कभी हारता नही
सपनो को पूरा करने से हटता नही
होंगे तो पुर कभी ये सपने मेरे
वरना जिंदगी के कुछ सपने अधूरे ही सही.

Ashish Vishwakarma
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