प्यार से सजती है हर सुबह उसकी

हर शरारत में झलकती है मासूमियत उसकी
शानदार लगती हैं अब मुझे हर बातें उसकी
कभी मांझी तो कभी कारवां सा लगता है वो
खुदा का फरमान लगता है हर गुजारिश उसकी

बहार बन गयी जिंदगी जब से आई है वो पास मेरे
प्यारी सी है वो और फूलों सी महकती सांसें उसकी
कभी सोचता हूँ की क्या जिंदगी होती उसके बिन
अब मेरे ही प्यार से सजती है हर सुबह उसकी

 

 

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कभी सोच कर देखा नहीं मैने

कभी सोच कर देखा नहीं मैने

सूरज की रोशनी तेज है या चाँद की चाँदनी
अंधेरे को चीरने वाला बड़ा या दिन मे राह दिखाने वाला
कभी सोच कर देखा न मैने
और इस दुनिया को ऐसे समझा ना मैने

अपनी बेटी कहते जिसे बड़ा किया माँ पापा ने
एक नया बंधन जुड़ने पर पराई क्यूँ हो जाती है
कभी सोच कर देखा नहीं मैने
और इस रीत को कभी अपनाया ना मैने

खुद के आँसू छुपा कर बड़ा करती सबकी माँ
बड़े होकर उन्ही बच्चों के लिए तरस जाती है वो माँ
कभी सोच कर देखा नहीं मैने
और इस रिश्ते की गहराई को जाना ना मैने

ऐसे ही सवाल आते हैं आज मन में
बिन जवाब के रह जाते हैं ये अधूरे
कभी सोच कर देखा ना मैने
और आज आपके मन तक पहुँचाया मैने

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खुशनसीब हूँ मैं

एक नन्हा सा मेहमान आया जिंदगी मे मेरे
खुशनसीब हूँ मैं जो खुदा ने चुना इसे मेरे लिए

पाकीज़ा रिश्ता ये तेरा मेरा जो दुनिया से परे
चाहूं मैं तुझको इतना दुनिया मे बिना किसी से डरे

नटखट सी मुस्कान तेरी, ईमानदारी तेरे अश्कों मे
दर्द तुझे जब भी होता दिल मेरा टूटता टुकड़ों मे

नज़र हटती नही जब भी तू यूँ मुझको देखे
बिन तेरे ना जिंदगी चाहूं ना चाहूं सपने दिखे…

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दिल के कोने मे

दिल मे बसा कर उसका चेहरा खो गया मैं कहीं
वो मासूम समझ ना सकी अबसे वो जहाँ मैं वहीं
दिल के कोने मे समेट की उसकी झलक मैं कहीं
डूबता हूँ जा रहा इश्क़ की गहराइयाँ हैं वहीं
बसी है दिलरुबा तू कुछ इस तरह दिल मे यहीं
चाहकर भी मेरा दिल उससे जुड़ा नहीं
वो है तो दुनिया होगी हसीन यहीं
बसी है मेरे जहाँ मे उसकी ही तस्वीर हर कहीं

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तेरे ही दीदार से दिलबर

तेरे ही दीदार से दिलबर हर सुबह होती है
तेरे रहने से ही मेरी जिंदगी गुलजार होती है

मौसम बदल जाते हैं जब वो मुझसे रूठ जाता है
मना लेते हूँ मैं जब उनसे आँखें चार होती हैं

कोई मिशाल नही दे सकता मैं उसकी जब वो मुस्कुराती है
पत्तों पर बारिश की बूँदों के जैसे ठहर जाती है

उसकी रेशम सी छाओं में मेरी उम्र गुजर रही है
उशे देखते हुए हर समय तकदीर मेरी संवर रही है

जब रास्ते में मिला वो तो लगा की वो अजनबी है
पर अब मेरी जिंदगी के हर रास्ते की मंज़िल वही है

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करीब हूँ मैं सागर से

याद आती हैं बहुत मुझे अपने गाँव की गलियाँ…

बारिश के बाद की भीनी सी खुश्बू और दोस्तों की रंग रेलियाँ …

दूरी ने एहसास दिलाया कितने करीब हूँ मैं सागर से…

कोई आकर दो बूँद देदे इन प्यासी यादों को उन गागर से…

अपना गाओं अपने लोग अपनी वो कही अनकही दास्तान…

कोई लौटा दे वो बचपन की हँसी और दिल की मुस्कान…

साथ चले जिन राहों पे दोस्तों के साथ…

कहीं ठोकर तो कहीं संभलकर याद आतें है वो हाथ…

भारत की चाट, कुबेर के छोले भतूरे, पीली कोठी पे सर झुकना…

स्कूटी पे यूँही घूमना, CDS की छत पर बैठना तो बालाजी मे दर्शन करना…

पल पल याद हैं बरसों के वो दिन…

मेरे गाओं मेरे अपने शहर के दिन…

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