वो बन गए जान महफ़िल की

वो जगमगा रहा हैं दिया सा
मैं जल रही हूँ बत्ती सी|

वो महका सा हैं खुशबू सा
मैं मुरझा रही हूँ फूलो सी|

वो बन गए जान महफ़िल की
और मैं खो रही हूँ तन्हाई मैं|

वो खुश जी रहा हैं अपनी दुनिया मैं
और मैं जीती रही उसकी याद मैं|

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मोहब्बत का आगाज़

यह ता-उमर का प्यार नहीं
बस कुछ मोहलत का साथ है

सरारत जो दिल ने की है
बस उसी का भुगतान है

हर रोज़ गुज़ारिश होती है
बस उनके ही दीदार की

यह किसी कारवां की शुरुवात नहीं
बस मोहब्बत का आगाज़ है

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तेरा ही रूप तेरा ही साया है

मेरी जिंदगी आईना है
तेरा ही रूप तेरा ही साया है
जो मैं हूँ तेरी सी ही हूँ
मुझ में मेरा अब रहा क्या है

तू गर रूप है तो मैं रंग बन जाऊं
तू गर रंग दे तो इश्क़ कह लाऊं
तू लाल रंग दे तो तेरी हो जाऊं
जो रंग दे हरा तो दीवानी कह लाऊं

तू दे साथ तो तेरी धूल बन जाऊं
तू चल दे अकेला तो तेरे निसान बन जाऊं
तू थाम ले मुझे तो तेरी हंसी बन जाऊं
जो छोड़ दे मुझे तो आँखो से बह जाऊं

तू गर हक़ीकत बने तो मैं सवेरा बन जाऊं
तू गर सपना हो तो मैं रात बन जाऊं
तू गर महफ़िल दे तो साज़ बन जाऊं
तू गर तन्हाई दे तो मोंम बन जाऊं

मेरी जिंदगी एक आइना है
तेरा ही रूप तेरा ही साया है
तू गर रूप दे तो मैं रंग बन जाऊं
तू गर रंग दे तो मैं इश्क़ कहे लाऊं

तू गर चाहे जो रात को मैं चांदनी बन जाऊं
तू गर माने उश रब को तो मैं दुआ बन जाऊं
तू गर पुकारे प्यार से
तू मैं आवाज़ बन जाऊं
रात को ख़ामोशी को तेरे नाम कर जाऊं

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इस बेनाम सी मोहब्बत को क्या नाम दूं

इस बेनाम सी मोहब्बत को क्या नाम दूं
जी करता है उनका ही दामन थाम जिंदगी गुजार दूं
बन के मेहमान दिल में जगह बनानी थी
अब सेर-ओ-आँखो मैं बैठा कर सरताज इन्हें नाम दूं

जब देखते है वो तो मेहताब सा शमां होता है
उनकी मौजूदगी से ही सारा आलम बनता है
इस नाचीज़ को उन से मोहब्बत बेहिशाब हो गयी
फिर यह मीरा अपने कान्हा की दाशी हो गयी

हम ने भले ही मोहब्बत की हो बेवफा से
पर ये पाकीज़ा मुहब्बत लोगों में आम हो गयी
माना की यह कहानी अधूरी रह गयी
पर खुदा की बंदगी तो देखो

मुझे प्यार की कहानी मैं आबाद कर गयी
यह बेनाम सी मुहब्बत हमें भले ही बदनाम कर गयी
पर इश्क़ का सरताज भी सर पर रख गयी
हाँ यह मोहबात-ए-शान हमें गली गली मशहूर कर गयी
यह बेनाम इस मुहब्बत हमारा नाम कर गयी

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कितनी अँधेरी है यॅ रात

तू आपने दर से उठा दे तो किधर जाऊँ
जब झोली तू ही खाली कर दे तो किधर जाऊँ
लाई थी कस्ती में लहरो से चीर कर
पर तू किनारे पर ही डूबा दे तो मैं किधर जाऊँ
हाँ मैं ग़रीब हूँ साहिब बोलो कैसे संभल जाऊँ

कितनी अँधेरी है यॅ रात मुरदो वाली
जहाँ क़ुबूल हुई सबकी दुआ सारी
वहाँ आँसू का दामन भीगा कर मैं घर आई
हाँ मई ग़रीब हू साहिब बोलो किस से मांग के दुआ लाऊँ

दामन है भीगा बैठे बैठे
आंशु है बहाए चलते चलते
आवारा हू फिरूं मैं गलियां गलियां
एक आशयानें की चाह में जाने कितने बरसो
हाँ ग़रीब हू साहिब बोलो कैसे अश्याम बनू

ये दर्द-ए-सफ़र रहने दे
मैं हार गयी चलते चलते
ये दुनिया की रीत है जो दिल का अमीर है
वो पैसे से ग़रीब है

बस कुछ लब्ज ही तो है मेरे पास
वो ही खर्च कर दूं तो कैसे यह फलसफा बया करूँ
रहने दे दिल-ए-नादान तू रहने ही दे
कों सुनने गा तेरी तू इसे कोरा कागज रहने ही दे
हाँ मई गरीब हूँ साहिब बोलो कैसे संभाल जाऊं

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ना जाने क्या जादू था

दिल में बसा कर उसका चेहरा खो गया मैं कही
महफ़िल में दिखती है अब वो ही हर कही
ना जाने क्या जादू था उसकी बातों में
खुशबू सी घोल गयी हर कहीं
उसकी नज़र मिलती थी झुकती थी
कितनी कहानी कहती थी कभी कभी
बसी है मेरी जहाँ में उसकी ही तस्वीर हर कहीं

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