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वो मिले अजनबी बनकर

किसी राह में किसी मोड़ पर वो मिले अजनबी बनकर
हर मोड़ पर दिया साथ मेरी ज़िदगी का हमसफ़र बनकर

जब पहली बार मुलाकात हुई तो वो थे जाने अंजाने से
फिर बस गये मेरी जिंदगी में एक प्यारी सी बहार बनकर

मिले थे तो सोचा ना था की प्यार हो जाएगा इस तरह
की बस जाएँगे वो मेरी नींदों में सुहाने ख्वाब की तरह

मैं उसे पागलों सा प्यार करता था हर वक़्त उसको सोचता था
उसी की ही बातें अपने सभी यारों से हर वक़्त करता था

मुलाकात से मुहब्बत तक की जिंदगी जिया करता था
की उनके लिए किसी भी हद तक जाने को दिल करता था

साथ उसके हर पल रहता था हर वक़्त उसे ही देखता था
पर मेरे इश्क़ की दीवानगी का उसे तो मालूम भी ना था

वो मुझे दोस्त मानती रही मैं उसे अपना प्यार समझता रहा
अपनी ही मुहब्बत का इज़हार करने का मैं इंतेजार करता रहा

लिखा ना उनको खत कभी बस दिल ही दिल में प्यार किया
डर था कहीं खो ना दूं उसे इसलिए प्यार का इज़हार ना किया

वक़्त गुज़रता रहा उसके लिए प्यार मेरा परवान चड़ता रहा
उसके बिन अब एक पल भी जीना मेरा हर दिन दूभर होता रहा

एक दिन हिम्मत करके सोचा की आज अपने दिल के बात बोल दूं
प्यार से प्यार कर प्यार को प्यारा सा तोहफा देकर अपना प्यार बना दूं

पर मैने अपने आपको रोक लिया दिल को टूटने से पहले जोड़ लिया
थोडा सोचा और खुद को प्यार करने से एक बार फिर रोक लिया

मैने दिल को माना लिया की ना करूँगा कभी इज़हार-ए-मुहब्बत
प्यार को पाना ही तो प्यार नही फिर रह जाए चाहे अधूरी मेरी इबादत

Ashish Vishwakarma
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