मेहमान वो मेरे दिल का

मेहमान वो मेरे दिल का यूँ तन्हा करके छोड़ गया
वीराने से इस दिल को टुकड़ों टुकड़ों में तोड़ गया
उसने नहीं की बेवफाई मुझसे ये तो जानता है दिल
फिर क्यूँ इस पाकीज़ा दिल को जंजीरों में बाँध गया

खुद्दार है ये दिल मेरा फिर भी उसकी राह देखता है
अंधियारी रात में ना जाने क्यूँ मेहताब को ढूंडता है
अकेला है मेरा दिल और अब खुशनसीब भी नहीं
फिर भी ना जाने पाकीज़ा दिल पत्थरों को ढूंडता है

Ashish Vishwakarma
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