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दुनिया ने ये कैसी रीत बनाई हैं

कभी सोच कर देखा नहीं मैंने।

दुनिया ने ये कैसी रीत बनाई हैं
माँ बाप के लिए बेटी क्यों पराई हैं।

जिनकी उंगली पकड़ कर चलना सीखा
करके बड़ा कहते है तू पराई हैं।

कैसे भूलू घर के आँगन को बाबुल
मेरे बचपन की यादे जिसमें समाई हैं।

माँ के आंचल की छाओं मे पली बड़ी
कैसे छोड़ सकती हूँ मायके की गली।

जिस आँगन मे अपना बचपन जिया
क्यों उस देहलीज़ से होती बिदाई हैं।

क्यों बेटी का रिस्ता इतना अजीब होता हैं
क्या बस यही हम बेटियों का नसीब होता हैं।

कभी सपने मे भी नहीं सोचा था मैने
ज़िन्दगी मे इक ऐसा भी मोड़ आएगा

सात फेरो से जन्मों का बंधन बंध जायेगा
और खून के रिस्ता अपना पीछे रह जायेगा।

Ashish Vishwakarma
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